अपने दुश्मन हज़ार निकले हैं

अपने दुश्मन हज़ार निकले हैं

हाँ मगर बा-वक़ार निकले हैं

हम भी क्या बादा-ख़्वार हो जाएँ

शैख़ तो बादा-ख़्वार निकले हैं

घर का रस्ता न मिल सका हम को

घर से जो एक बार निकले हैं

चाँद बिन चाँदनी कहाँ होगी

गो सितारे हज़ार निकले हैं

ख़ून-ए-दिल दे के जिन को सींचा था

नख़्ल सब ख़ार-दार निकले हैं

बंद कूचे की दूसरी जानिब

रास्ते बे-शुमार निकले हैं

बा'द इक उम्र की ख़मोशी के

मिसरे सब ज़ोर-दार निकले हैं

हम तो समझे थे मस्त हैं 'आसी'

आप भी होशियार निकले हैं

कोई कहता था ख़ुश हैं 'आसी-जी'

वो मगर दिल-फ़िगार निकले हैं

(808) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554