पर्दा उठा के मेहर को रुख़ की झलक दिखा कि यूँ

पर्दा उठा के मेहर को रुख़ की झलक दिखा कि यूँ

बाग़ में जा के सर्व को क़द की लचक दिखा कि यूँ

आतिश-ए-गुल चमन के बीच जब हमा सू हो शोला-ज़न

अपने लिबास-ए-सुर्ख़ की उस को भड़क दिखा कि यूँ

जो कोई पूछे जान-ए-मन शोख़ी ओ जल्वा किस तरह

लम्अ-ए-बर्क़ की तरह एक झमक दिखा कि यूँ

शीशे के बीच दुख़्त-ए-रज़ करती है शोख़-चश्मियाँ

तू भी टुक अपनी चश्म की उस को भड़क दिखा कि यूँ

नज़रें मिलावे गर कोई तुझ से कभी तो जान-ए-मन

उस के तईं तू दूर से आँखें तनिक दिखा कि यूँ

कब्क ओ तदरौ गर करें आगे तिरे ख़िराम-ए-नाज़

अपने ख़िराम-ए-नाज़ की उन को लटक दिखा कि यूँ

रातों को तुझ से जागना गर कोई पूछे 'मुसहफ़ी'

चश्म-ए-सितारा बाज़ हैं उस को फ़लक दिखा कि यूँ

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