मुक़ाबले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
मुक़ाबले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
ये वलवले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
क़रीब आओ तो शायद समझ में आ जाए
कि फ़ासले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
है मेरे साथ मिरे दुश्मनों से रब्त उन्हें
ये सिलसिले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
अगर है कोई शिकायत तो मिल के बात करो
मुरासिले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
किसी ने क़त्ल किया और सज़ा किसी को मिली
ये फ़ैसले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
जो रहज़नों का तआवुन क़ुबूल करते हैं
वो क़ाफ़िले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
तनाज़ेआत में बेहतर है सुल्ह कर लेना
नए गिले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
ये लग़्ज़िशों का तसलसुल ये माज़रत पैहम
ये मरहले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
चराग़-ए-हक़ हैं तो ख़ामोश क्यूँ हैं वो 'रज़्मी'
बिना जले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं
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मुज़फ़्फ़र रज़्मी