रक़्स

नाच हाँ नाच कि हर शोरिश-ओ-हंगामा पर

फैल जाए तिरी झन-झन का हसीं पैराहन

नाच हाँ नाच कि सीने में तिरे

एक मोती की तरह राज़ ज़माने का सिमट कर रह जाए

बाज़ुओं को कभी होने दे दराज़

जम्अ करने दे ख़द-ओ-ख़ाल कभी अपनी हसीं आँखों को

फ़र्श-ए-आवाज़ पे रख अपने पुर-असरार क़दम

और चमकते हुए संगीत का जादू पी जा

नाच सद-नश्शा-ओ-शादाबी से

नाचती जा इसी मस्ती में कि तू एक कँवल बन जाए

और तुझ को किसी तालाब के सीने में उतार आएँ हम

भूत आ कर तिरी रंगत में बसेरा कर लें

और हम

बूढ़े दरख़्तों की कुहन-साल लटकती हुई शाख़ों

से लिपट कर रोएँ

साल-हा-साल लिपट कर रोएँ

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