दिलों को तोड़ने वालो तुम्हें किसी से क्या

दिलों को तोड़ने वालो तुम्हें किसी से क्या

मिलो तो आँख चुरा लो तुम्हें किसी से क्या

हमारी लग़्ज़िश-ए-पा का ख़याल क्यूँ है तुम्हें

तुम अपनी चाल सँभालो तुम्हें किसी से क्या

चमक के और बढ़ाओ मिरी सियह-बख़्ती

किसी के घर के उजालो तुम्हें किसी से क्या

नज़र बचा के गुज़र जाओ मेरी तुर्बत से

किसी पे ख़ाक न डालो तुम्हें किसी से क्या

मुझे ख़ुद अपनी नज़र में बना के बेगाना

जहाँ को अपना बना लो तुम्हें किसी से क्या

क़रीब-ए-नज़अ' भी क्यूँ चैन ले सके कोई

नक़ाब रुख़ से उठा लो तुम्हें किसी से क्या

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