जिस दम वो सनम सवार होवे

जिस दम वो सनम सवार होवे

ता-सैद-ए-हरम शिकार होवे

जो उठ न सके तिरी गली से

रहने दे कि ता-ग़ुबार होवे

मोहकम तू रज़्ज़ाक़ बन सके है

गो उम्र कि पाएदार होवे

वो क़स्र तो चाहता नहीं मैं

जिस में गुल ओ गुल-एज़ार होवे

वुसअत मिरे सीने बीच ऐ दहर

टुक दिल को शगुफ़्ता वार होवे

सोज़न की न जैब कीजो मिन्नत

यूँ फटियो कि तार तार होवे

शबनम से भरे है साग़र-ए-गुल

गर्दूं तो ख़राब-ओ-ख़्वार होवे

पानी नहीं देते उस को ज़ालिम

जो ज़ख़्मी-ए-बे-शुमार होवे

नासेह तू क़सम ले हम से, दिल पर

अपना कभू इख़्तियार होवे

खींचे है कोई भी तेग़ प्यारे

जमधर कि जब आब-दार होवे

किन ज़ख़्मों में ज़ख़्म है कि जब तक

छाती के न वार पार होवे

खींची है भवाँ ने तेग़ मुख पर

'सौदा' से कहो निसार होवे

वैसे ही काहे ये काम गुल-रू

आशिक़ ही न गो हज़ार होवे

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