नासेह को जेब सीने से फ़ुर्सत कभू न हो

नासेह को जेब सीने से फ़ुर्सत कभू न हो

दिल यार से फटे तो किसी से रफ़ू न हो

इस दिल को दे के लूँ दो जहाँ ये कभू न हो

सौदा तो होवे तब ये कि जब उस में तू न हो

आईना-ए-वजूद अदम में अगर तिरा

वो दरमियाँ न हो तो कहीं हम को रू न हो

झगड़ा तो हुस्न ओ इश्क़ का चुकता है पल के बीच

गर महकमे में क़ाज़ी के तू रू-ब-रू न हो

क़तरे की खुल गई है गिरह वर्ना ऐ नसीम

शोर-ए-दिमाग़ मुर्ग़-ए-चमन गुल की बू न हो

गुज़रे सो गुज़रे अहल-ए-ज़मीं ऊपर ऐ फ़लक

आइंदा याँ तलक तो कोई ख़ूब-रू न हो

दिल ले के तुझ से बर्क़ के शोले को दीजिए

पर है ये डर कि उस की भी ऐसी ही ख़ू न हो

गुल की न तुख़्म मुर्ग़-ए-चमन कर सके तलाश

हम ख़ाम-फ़ितरतों से तिरी जुस्तुजू न हो

'सौदा' बदल के क़ाफ़िया तू इस ग़ज़ल को कह

ऐ बे-अदब तू दर्द से बस दू-ब-दू न हो

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