मिरे क़रीब से गुज़रा इक अजनबी की तरह

मिरे क़रीब से गुज़रा इक अजनबी की तरह

वो कज-अदा जो मिला भी तो ज़िंदगी की तरह

मिला न था तो गुमाँ उस पे था फ़रिश्तों का

जो अब मिला है तो लगता है आदमी की तरह

किरन किरन उतर आई है रौज़न-ए-दिल से

किसी हसीं की तमन्ना भी रौशनी की तरह

मिरी निगाह से देखो तो हम-ज़बाँ हो जाओ

कि दुश्मनी भी किसी की है दोस्ती की तरह

न मिलने वाले किनारों का नाम ठहरा शौक़

गुरेज़-पा है जहाँ हुस्न इक नदी की तरह

न खुल सका तो लहू हो के बह गया है दिल

कभी खिला तो महक उठेगा कली की तरह

हज़ार शे'र हैं और एक ख़ामुशी की अदा

हज़ार रंग हैं और एक सादगी की तरह

बहुत दिनों में मिले हैं हम आज 'इश्क़ी' से

नहीं वो फिर भी कोई शख़्स है उसी की तरह

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