मैं अपने दस्त पर शब ख़्वाब में देखा कि अख़गर था
मैं अपने दस्त पर शब ख़्वाब में देखा कि अख़गर था
सहर को खुल गई जब आँख मेरा हाथ दिल पर था
न थी ता-सुब्ह कुछ हाजत चराग़ ओ शम्अ ओ मिशअल की
हमारी बज़्म में शब जल्वा-गर वो माह-ए-पैकर था
तिरी इक जुम्बिश-ए-अबरू से आलम हो गया ज़ाए
नज़र कर जिस तरफ़ देखा तो जो धड़ था सो बे-सर था
तू इस रफ़्तार ओ क़द से जिस तरफ़ गुज़रा मिरे साहिब
तिरे फ़ैज़-ए-क़दम से हर क़दम सर्व ओ सनोबर था
न थी परवाज़ की ताक़त सर-ए-दीवार-ए-गुलशन तक
कि जो ताइर था सो सय्याद के हाथों से बे-पर था
चला जाता था 'हातिम' आज कुछ वाही-तबाही सा
जो देखा हाथ में उस के तिरे शिकवे का दफ़्तर था
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