गुलों पे साया-ए-ग़म-हा-ए-रोज़गार मिले

गुलों पे साया-ए-ग़म-हा-ए-रोज़गार मिले

भरी बहार के चेहरे भी सोगवार मिले

सजा दे उन के गरेबाँ को माह ओ अंजुम से

हमारे दस्त-ए-जुनूँ को जो इख़्तियार मिले

हज़ार दाग़ उठा कर चमन खिलाती है

कहीं ज़मीं को जो अहल-ए-ज़मीं का प्यार मिले

हमारे पास है क्या दौलत-ए-जुनूँ के सिवा

निसार चाक गरेबाँ अगर बहार मिले

ये वाक़िआ है कि नासेह की ज़िद में बात बढ़ी

जो एक बार न मिलते वो बार-बार मिले

मिज़ा के अश्क तमन्ना के ज़ख़्म याद के फूल

कई चराग़ सर-ए-शाम-ए-इंतिज़ार मिले

सहर से दैर ओ हरम पर जो बहस करते हैं

वो मय-कदे में सर-ए-शाम हम-कनार मिले

हम अपने चेहरा-ए-फ़न का निखार क्या देखें

कि आईने भी तो आलूदा-ए-ग़ुबार मिले

सुनीं तो आबला-पाई की दास्ताँ लेकिन

कहाँ 'शमीम' सा आशुफ़्ता-ए-बहार मिले

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