हर एक नक़्श तिरे पाँव का निशाँ सा है

हर एक नक़्श तिरे पाँव का निशाँ सा है

हर एक राहगुज़र तेरा आस्ताँ सा है

कहीं सिमट के न रह जाए हिम्मत-ए-परवाज़

कि शाख़ शाख़ पे पिन्हाँ इक आशियाँ सा है

अभी गुलों की नज़र से नज़र नहीं मिलती

अभी फ़ज़ा-ए-चमन में धुआँ धुआँ सा है

न जाने शौक़ की वो रात कट गई कैसे

हर एक लम्हा जहाँ उम्र-ए-जावेदाँ सा है

उजड़ गई है मिरी काएनात-ए-दिल फिर भी

मिरी निगाह में आबाद इक जहाँ सा है

ज़बाँ पे नाम भी आता है तेरा रुक रुक कर

हर एक तार-ए-नफ़स दिल का पासबाँ सा है

ये किस ने आज जगाई है अहद-ए-रफ़्ता की याद

ये कौन दल के क़रीं आज नौहा-ख़्वाँ सा है

लगे हैं दिल से उभरने वफ़ा के अफ़्साने

कि अपने हाल पे फिर कोई मेहरबाँ सा है

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