अपनी तहज़ीब की दीवार सँभाले हुए हैं

अपनी तहज़ीब की दीवार सँभाले हुए हैं

मेरे बच्चे मिरा घर-बार सँभाले हुए हैं

तू ने कुछ भी न दिया हम को अज़िय्यत के सिवा

ज़िंदगी हम तुझे बेकार सँभाले हुए हैं

कोई आता नहीं अब उन की क़दम-बोसी को

दोनों हाथों से वो दस्तार सँभाले हुए हैं

वक़्त से आगे निकल जाएँगे जब चाहेंगे

दिल-गिरफ़्ता अभी रफ़्तार सँभाले हुए हैं

मुफ़लिसी झाँकती है रौज़न ओ दर से लेकिन

हम लरज़ती हुई दीवार सँभाले हुए हैं

ये भी इक तुर्फ़ा तमाशा है ख़ुदा-वन्द-ए-जहाँ

तेरी दुनिया को गुनहगार सँभाले हुए हैं

फ़ाक़ा-मस्ती में भी जीते हैं ब-आग़ाज़-ए-जुनूँ

ज़िंदगी हम तिरा पिंदार सँभाले हुए हैं

आबदीदा कभी होने नहीं देते 'अख़्तर'

मुझ को अब तक मिरे ग़म-ख़्वार सँभाले हुए हैं

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