फ़र्द को अस्र की रफ़्तार लिए फिरती है

फ़र्द को अस्र की रफ़्तार लिए फिरती है

जिंस को गर्मी-ए-बाज़ार लिए फिरती है

पर-ए-पर्वाज़ से इंकार नहीं है लेकिन

कीजिए ग़ौर तो मिन्क़ार लिए फिरती है

उस की क़िस्मत में रसाई न सही आशिक़ को

हसरत-ए-लज़्ज़त-ए-इज़हार लिए फिरती है

तालिब-ए-इल्म को इदराक-ए-फ़ज़ीलत के बजाए

ख़्वाहिश-ए-तुर्रा-ओ-दस्तार लिए फिरती है

दोनों टाँगों का इशारा है कि गर्दिश हम को

हर तरफ़ सूरत-ए-परकार लिए फिरती है

एक लम्हे के लिए भी नहीं मिलता है सुकूँ

गर्दिश-ए-गुम्बद-ए-दव्वार लिए फिरती है

हथकड़ी जैसे लगाते हैं असीरों को वो ज़ुल्फ़

कर के हल्क़े में गिरफ़्तार लिए फिरती है

तौफ़ में फ़र्त-ए-तरब से है ज़मीं चर्ख़-ए-ज़नाँ

साया-ए-गेसू-ओ-रुख़सार लिए फिरती है

जिस्म के बोझ को आग़ाज़ से अंजाम तलक

गरचे है रूह गिराँ-बार लिए फिरती है

इस को ठहराए हुए क़स्र-ए-बक़ा की बुनियाद

ज़िंदगी साँस का इक तार लिए फिरती है

(644) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554