जहाँ निगार-ए-सहर पैरहन उतारती है
जहाँ निगार-ए-सहर पैरहन उतारती है
वहीं पे रात सितारों का खेल हारती है
शब-ए-विसाल तिरे दिल के साथ लग कर भी
मिरी लुटी हुई दुनिया तुझे पुकारती है
शुमार-ए-शौक़ में उलझी हुई शुआ-ए-नज़र
हज़ार रूठते रंगों के रूप धारती है
उफ़ुक़ से फूटते महताब की महक जैसे
सुकून-ए-बहर में इक लहर सी उभारती है
पस-ए-दरीचा-ए-दिल याद-ए-बू-ए-जू-ए-नशात
न जाने कब से खड़ी काकुलें सँवारती है
दर-ए-उमीद से हो कर निकलने लगता हूँ
तो यास रौज़न-ए-ज़िंदाँ से आँख मारती है
जहाँ से कुछ न मिले हुस्न-ए-माज़रत के सिवा
ये आरज़ू उसी चौखट पे शब गुज़ारती है
जो एक जिस्म जलाती है बर्क़-ए-अब्र-ए-ख़याल
तो लाख ज़ंग-ज़दा आइने निखारती है
(1291) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
ज़फ़र इक़बाल