रह रह के ज़बानी कभी तहरीर से हम ने

रह रह के ज़बानी कभी तहरीर से हम ने

क़ाएल किया उस को इसी तदबीर से हम ने

किस सम्त लिए जाते हो और क्या है इरादा

पूछा न कभी अपने इनाँ-गीर से हम ने

दिल पर कोई क़ाबू न रहा जब तो किसी तौर

बाँधा है ये वहशी तिरी ज़ंजीर से हम ने

हर बार मदद के लिए औरों को पुकारा

या काम लिया नारा-ए-तकबीर से हम ने

बेहतर है कि अब काम कोई और किया कर

ये भी न कहा कातिब तक़दीर से हम ने

अपनी ही करामात दिखाते रहे सब को

सरक़ा न किया मोजज़ा-ए-'मीर' से हम ने

तख़रीब तो करते रहे सौ तरहा की लेकिन

ये काम किया जज़्बा-ए-तामीर से हम ने

अब देखिए क्या इस का निकलता है नतीजा

माथा है लगाया हुआ तासीर से हम ने

वो बाम-ए-तमाशा हुआ ग़ाएब तो 'ज़फ़र' आज

लटका लिया ख़ुद को किसी शहतीर से हम ने

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