गली से तिरी जो कि ऐ जान निकला

गली से तिरी जो कि ऐ जान निकला

गरेबाँ से दस्त-ओ-गरेबान निकला

तिरी आन पे ग़श हूँ हर आन ज़ालिम

तो इक आन लेकिन न याँ आन निकला

यही मुझ को रह रह के आता है अरमाँ

कि तुझ से न कुछ मेरा अरमान निकला

मिरी आह-ए-आतिश-फ़िशाँ देखती है

लिए घर से हर आन क़ुरआन निकला

मिरी जान शर्त-ए-रिफ़ाक़त नहीं ये

निकल जान तू भी कि पैकान निकला

किया मैं ने मुजरा तो झुँझला के बोला

कहाँ का मिरा जान पहचान निकला

अजब बे-बहा है मिरा अश्क यारो

ये कम-बख़्त लड़का तो तूफ़ान निकला

मुझे शैख़ उल्फ़त से माने है 'एहसाँ'

वली जिस को समझा था शैतान निकला

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