मरते दम नाम तिरा लब के जो आ जाए क़रीब

मरते दम नाम तिरा लब के जो आ जाए क़रीब

जी को ठंडक हो तप-ए-ग़म न मिरे आए क़रीब

बोसा माँगूँ तो कहें मुझ से ये बुलवा के क़रीब

किस का मुँह है जो मिरे मुँह के वो मुँह लाए क़रीब

हाथ दौड़ाऊँ न क्यूँ जबकि वो यूँ आए क़रीब

पाँव फैलाऊँ न क्यूँ पाँव जो फैलाए क़रीब

पास आऊँ तो कहे पास-ए-अदब भी है ज़रूर

दूर जाऊँ तो वहाँ जाए तक़ाज़ा-ए-क़रीब

मुझ को ऐ पीर-ए-मुग़ाँ मोहतसिब-ए-ना-हंजार

क़ुर्ब-ए-महशर है कि बे-क़ुर्बी से बुलवाए क़रीब

ग़म-ए-दूरी से तिरे कूचे के रोया आशिक़

वाँ से जब रौज़ा-ए-रिज़वान उसे लाए क़रीब

मेरी बेदारी से ऐ दौलत-ए-बेदार हो क्या

बख़्त जागें जो मुझे अपने तो बुलवाए क़रीब

मेरे नालों से न दिन चैन न शब को है क़रार

मर्ग के पहुँचे हैं अब तो मिरे हम-साए क़रीब

ऐसी मज्लिस से अगर रहिए बईद औला है

दिल दिमाग़ अपना तो वो और ये ग़ौग़ा-ए-क़रीब

पास जाऊँ तो मचल कर कहे चल याँ से दूर

दूर बैठूँ तो घुड़क कर मुझे फ़रमाए क़रीब

इश्क़ के पेच में हूँ चाहिए हमदम पस-ए-मर्ग

इशक़-ए-पेचाँ ही मिरी क़ब्र के लगवाए क़रीब

मुश्क-ओ-संदल हो तिरे रंग से बालों हम-सर

ग़ुस्सा दिल को मिरे किस तरह न आ जाए क़रीब

कुछ रदीफ़ अब की बढ़ा क़ाफ़िया 'एहसाँ' तू बदल

फिर क़रीब ऐसे बिठा तुझ को वो बिठलाए क़रीब

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