पंछियों के रू-ब-रू क्या ज़िक्र-ए-नादारी करूँ
पंछियों के रू-ब-रू क्या ज़िक्र-ए-नादारी करूँ
पँख टूटे ही सही उड़ने की तय्यारी करूँ
छोड़ जाऊँ अपने पीछे आलम-ए-हैरत तमाम
मौत के पहलू में छुप कर शो'बदा-कारी करूँ
नाचती है जुम्बिश-ए-अंगुश्त पर वो फ़ाहिशा
ज़िंदगी कह कर जिसे ख़ुद से रिया-कारी करूँ
सब्ज़ पौदों की तरफ़ बढ़ने लगी सरकश हवा
उस के कपड़े नोच लूँ थोड़ी गुनाह-गारी करूँ
नन्ही-मुन्नी कोंपलों को रंग-ओ-निकहत चाहिए
कुछ हवा का ख़ौफ़ कुछ मौसम की दिलदारी करूँ
गुनगुनाते शोख़ पंछी लहलहाती खेतियाँ
नित-नए ख़्वाबों से नम आँखों में गुल-कारी करूँ
मर्सिया अपना सुनाऊँ शहर-ए-ना-पुरसाँ के बीच
पत्थरों से और क्या उम्मीद-ए-ग़म-ख़्वारी करूँ
(1536) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
अब्दुर्रहीम नश्तर