अब तक इलाज-ए-रंजिश-ए-बे-जा न कर सके

अब तक इलाज-ए-रंजिश-ए-बे-जा न कर सके

इक उम्र में भी हुस्न को अपना न कर सके

थी एक रस्म-ए-इश्क़ सो हम ने भी की अदा

दुनिया में कोई काम अनोखा न कर सके

कल रात दिल के साथ बुझे इस तरह चराग़

यादों के सिलसिले भी उजाला न कर सके

अब इस से क्या ग़रज़ है कि अंजाम क्या हुआ

ये तो नहीं कि तेरी तमन्ना न कर सके

ख़ुद इश्क़ ही को दे गए रुस्वाइयों के दाग़

वो राज़-ए-हुस्न हम जिन्हें इफ़शा न कर सके

ज़ौक़-ए-जुनूँ को रास नहीं तंग बस्तियाँ

सहरा न हो तो क्या कोई दीवाना कर सके

हर इम्तियाज़ उस के लिए हेच है 'सहर'

जो अपनी ज़िंदगी को तमाशा न कर सके

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