वहशत में दिल कितना कुशादा करना पड़ता है

वहशत में दिल कितना कुशादा करना पड़ता है

इन गीली आँखों को सहरा करना पड़ता है

मुझ को इक आवाज़ तिरी सुनने की कोशिश में

कितने सन्नाटों का पीछा करना पड़ता है

तब खुलती है हम पर क़द्र-ओ-क़ीमत फूलों की

जब काँटों के साथ गुज़ारा करना पड़ता है

यार बड़ा बन कर रहना आसान नहीं होता

अपने आप को कितना छोटा करना पड़ता है

कोह-ए-गिराँ हाइल होता है जिस के रस्ते में

इक दिन उस को तेज़ धमाका करना पड़ता है

अपने घर की बातें 'आज़िम' घर तक रखने में

दीवार-ओ-दर से समझौता करना पड़ता है

(915) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554