ऐ हुस्न जब से राज़ तिरा पा गए हैं हम

ऐ हुस्न जब से राज़ तिरा पा गए हैं हम

हस्ती से अपनी और क़रीब आ गए हैं हम

यूँ भी हुआ कि जान गँवा दी तिरे लिए

यूँ भी हुआ कि तुझ से भी कतरा गए हैं हम

राह-ए-वफ़ा में ऐसे मक़ामात भी मिले

अपना सर-ए-नियाज़ भी ठुकरा गए हैं हम

यादश-ब-ख़ैर इक गुल-ए-शादाब थे कभी

ऐसी ख़िज़ाँ पड़ी है कि कुम्हला गए हैं हम

सुब्ह-ए-विसाल थी तो तबीअत थी बाग़ बाग़

शाम-ए-फ़िराक़ आई तो सँवला गए हैं हम

इंसान तेरी फ़तह पे अब भी यक़ीन है

गो अपनी ज़िंदगी से भी घबरा गए हैं हम

महरूमियों का बार-ए-गिराँ दोश पर लिए

ऐ मौत सुन कि तेरे क़रीब आ गए हैं हम

अपने सुबू में तलख़ी-दौराँ समेट कर

बा-सद-ख़ुलूस नोश भी फ़रमा गए हैं हम

तारीख़-ए-इन्क़िलाब-ए-ज़माना से पूछ लो

जब जब सदा मिली सर-ए-दार आ गए हैं हम

'अजमल' जब उन की बज़्म में छेड़ी है दिल की बात

अपने तो ख़ैर ग़ैर को तड़पा गए हैं हम

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