पर्दे मिरी निगाह के भी दरमियाँ न थे

पर्दे मिरी निगाह के भी दरमियाँ न थे

क्या कहिए उन के जल्वे कहाँ थे कहाँ न थे

जिस रास्ते से ले गई थी मुझ को बे-ख़ुदी

उस राह में किसी के क़दम के निशाँ न थे

राज़-आश्ना है मेरी नज़र या फिर आइना

वर्ना वो अपने हुस्न के ख़ुद राज़-दाँ न थे

कुछ बे-सदा से लफ़्ज़ नज़र कह गई ज़रूर

माना लब-ए-ख़मोश रहीन-ए-बयाँ न थे

आए तो यूँ कि जैसे हमेशा थे मेहरबाँ

भूले तो यूँ कि जैसे कभी मेहरबाँ न थे

'अशरफ़' फ़रेब-ए-ज़ीस्त है कब इम्तिहाँ से कम

इस के सिवा तो और यहाँ इम्तिहाँ न थे

(886) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554