इस बार हवाओं ने जो बेदाद-गरी की
इस बार हवाओं ने जो बेदाद-गरी की
फिर मेरे चराग़ों ने भी शोरीदा-सरी की
मैं ने किसी हँसते हुए लम्हे की तलब में
इस शहर-ए-दिल-आवेज़ में बस दर-ब-दरी की
कुछ और वसीला मिरे इज़हार को कम था
सौ मैं ने मिरी जान सदा शेर-गरी की
ऐ अहद-ए-रवाँ मैं तिरा मेहमान हुआ था
लेकिन तिरे लोगों ने बड़ी बे-ख़बरी की
हालाँकि कई लोग हैं नाराज़ भी मुझ से
जो बात भी की मैं ने बहर-ए-हाल खरी की
पढ़ लेती हैं लफ़्ज़ों का तनफ़्फ़ुस मिरी सोचें
कुछ दाद तो दी जाए मिरी दीदा-वरी की
मैं वो कि हूँ सदियों की मसाफ़त का मुसाफ़िर
हर लम्हे की आहट ने मिरी हम-सफ़री की
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अज़ीज़ नबील