मुझे जीना नहीं आता

मैं जैसे दर्द का मौसम

घटा बन कर जो बस जाता है आँखों में

धनक के रंग ख़ुशबू नज़्र करने की तमन्ना ले के जिस मंज़र तलक जाऊँ

सियह अश्कों के गहरे कोहर में डूबा हुआ पाऊँ

में अपने दिल का सोना

प्यार के मोती

तरसती आरज़ू के फूल जिस दर पर सजाता हूँ

वहाँ जैसे मकीं होता नहीं कोई

बना हूँ एक मुद्दत से सदा-ए-बाज़गश्त ऐसी

जो दीवारों से टकराए

हिरासाँ हो के लौट आए

धड़कते दिल के सूने-पन को सूना और कर जाए

मैं अपने आप को सुनता हूँ

अपने आप को छूता हूँ

अपने आप से मिलता हूँ ख़्वाबों के सुहाने आइना-घर में

तो मेरा अक्स मुझ पर मुस्कुराता है

ये कहता है

सलीक़ा तुझ को जीने का न आना था नहीं आया

सदाएँ पत्थरों की तरह मुझ पर

मेरे ख़्वाबों के बिखरते आइना-घर पर बरसती हैं

उधर तारा इधर जुगनू

कहीं इक फूल की पत्ती कहीं शबनम का इक आँसू

बिखर जाता है सब कुछ रूह के सुनसान सहरा में

मैं फिर से ज़िंदगी करने के अरमाँ में

इक इक रेज़े को चुनता हूँ सजाता हूँ नई मूरत बनाता हूँ

धनक के रंग ख़ुशबू नज़्र करने की तमन्ना में क़दम आगे बढ़ाता हूँ

तो इक बे-नाम गहरी धुँद में सब डूब जाता है

किसी से कुछ शिकायत है न शिकवा है

कि मैं तो दर्द का मौसम हूँ

अपने आप में पलता हूँ अपने आप में जीता हूँ

अपने आँसुओं में भीगता हूँ मुस्कुराता हूँ

मगर सब लोग कहते हैं

तुझे जीना नहीं आता

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