जिस्म में ख़्वाहिश न थी एहसास में काँटा न था

जिस्म में ख़्वाहिश न थी एहसास में काँटा न था

इस तरह जागा कि जैसे रात-भर सोया न था

अब यही दुख है हमीं में थी कमी उस में न थी

उस को चाहा था मगर अपनी तरह चाहा न था

जाने वाले वक़्त ने देखा था मुड़ कर एक बार

गो हमें पहचानता कम था मगर भूला न था

हम बहुत काफ़ी थे अपने वास्ते जैसे भी थे

कोई हम सा दोस्त कोई हम सा बेगाना न था

अजनबी राहें न जाने किस तरह आवाज़ दें

जब सफ़र पर चल पड़े थे किस लिए सोचा न था

पाँव का चक्कर लिए फिरता रहेगा दोस्तो

और फिर सोचोगे अपने शहर में क्या क्या न था

हम भी उन रातों में थाली पर दिया रख कर चले

जब शिवाले की इमारत का कोई दर वा न था

फ़र्ज़ की मंज़िल ने मेरी गुमरही भी छीन ली

वर्ना 'अश्क' इस रस्ती-बस्ती राह में क्या क्या न था

(1067) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554