नज़रों के गिर्द यूँ तो कोई दायरा न था
नज़रों के गिर्द यूँ तो कोई दायरा न था
अपने सिवाए कुछ भी मगर सूझता न था
सब खिड़कियाँ थीं बंद कोई दर खुला न था
जाते कहाँ कि ख़ुद से परे रास्ता न था
क्या जाने किस ख़याल से चुप हो के रह गया
ऐसा नहीं कि ग़म मुझे पहचानता न था
होंटों के पास आ न सका जाम उम्र-भर
हालाँकि फ़ासला ये कोई फ़ासला न था
वो जिस ने ज़िंदगी का मिरी रुख़ बदल दिया
वो आप थे हुज़ूर कोई दूसरा न था
पूछी किसी ने राह तो चुप हो के रह गए
कहते भी क्या कि ख़ुद हमें अपना पता न था
अब के कुछ इस तरह से भी आई 'कँवल' बहार
सारे चमन में एक भी पत्ता हरा न था
(1151) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554