दयार-ए-शब का मुक़द्दर ज़रूर चमकेगा

दयार-ए-शब का मुक़द्दर ज़रूर चमकेगा

यहीं कहीं से चराग़ों का नूर चमकेगा

कहाँ हूँ मैं कोई मूसा कि इक सदा पे मिरी

वो नूर फिर से सर-ए-कोह-ए-तूर चमकेगा

तिरे जमाल का नश्शा शराब जैसा है

हमारी आँखों से उस का सुरूर चमकेगा

भरम जो प्यास का रक्खेगा आख़िरी दम तक

उसी के हाथ में जाम-ए-तुहूर चमकेगा

ये कह के दार पे ख़ुद को चढ़ा दिया मैं ने

कि दार पर भी सर-ए-बे-क़ुसूर चमकेगा

लुटे हुए हैं मगर हम अभी नहीं मायूस

हमारे ताज में फिर कोह-ए-नूर चमकेगा

तलाश करता है मुझ मुश्त-ए-ख़ाक में तू अबस

ग़ुरूर होगा जभी तो ग़ुरूर चमकेगा

मता-ए-फ़न से नवाज़ा गया है तुझ को 'फ़राग़'

इसी से नाम तिरा दूर दूर चमकेगा

(1175) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554