उसी ख़ुश-नवा में हैं सब हुनर मुझे पहले था न क़यास भी

उसी ख़ुश-नवा में हैं सब हुनर मुझे पहले था न क़यास भी

उसी ख़ुश-नवा पे सजा है क्या मिरी शाइ'री का लिबास भी

वो ग़ज़ल का रूप लिए हुए मुझे हर मक़ाम पे ले गया

कभी दश्त-ए-यार के दरमियाँ कभी शहर-ए-फ़िक्र के पास भी

जिसे इतना औज-ए-नज़र मिला उसे क्यूँ न दर्द-ए-ज़मीं मिले

किसी फ़लसफ़े का नुज़ूल है तिरे लब पे कलमा-ए-यास भी

कोई जैसे नोक-ए-सिनाँ लिए शब-ओ-रोज़ सर पे खड़ा रहा

है अज़िय्यतों के शुमार में ये अज़िय्यतों का हिरास भी

रुख़-ए-दाग़-ए-दल के सिवा 'हसन' मैं नवा-ए-बे-दिल-ओ-शाद हूँ

इन्ही आशिक़ों का है रंग भी उन्ही कामिलों का है बास भी

(965) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554