आख़िरी आदमी का रजज़
मुसाहिबीन-ए-शाह मुतमइन हुए कि सरफ़राज़ सर-बुरीदा बाज़ुओं समेत शहर की फ़सील पर लटक रहे हैं
और हर तरफ़ सुकून है
सुकून ही सुकून है
फ़ुग़ान-ए-ख़ल्क़ अहल-ए-ताइफ़ा की नज़्र हो गई
मता-ए-सब्र वहशत-ए-दुआ की नज़्र हो गई
उमीद-ए-अज्र बे-यक़ीनी-ए-जज़ा की नज़्र हो गई
न ए'तिबार-ए-हर्फ़ है न आबरू-ए-ख़ून है
सुकून ही सुकून है
मुसाहिबीन-ए-शाह मुतमइन हुए कि सरफ़राज़ सर-बुरीदा बाज़ुओं
समेत शहर की फ़सील पर लटक रहे हैं और हर तरफ़ सुकून है
सुकून ही सुकून है
ख़लीज-ए-इक़्तिदार सरकशों से पाट दी गई
जो हाथ आई दौलत-ए-ग़नीम बाँट दी गई
तनाब-ए-ख़ेमा-ए-लिसान-ओ-लफ्ज़ काट दी गई
फ़ज़ा वो है कि आरज़ू-ए-ख़ैर तक जुनून है
सुकून ही सुकून है
मुसाहिबीन-ए-शाह मुतमइन हुए कि सरफ़राज़ सर-बुरीदा बाज़ुओं समेत शहर की फ़सील पर लटक रहे हैं
और हर तरफ़ सुकून है
सुकून ही सुकून है
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इफ़्तिख़ार आरिफ़