बदन को छू लें तिरे और सुर्ख़-रू हो लें

बदन को छू लें तिरे और सुर्ख़-रू हो लें

बिखरना ही है तो हम क्यूँ न मुश्कबू हो लें

चलें हैं इश्क़ की करने अगर इबादत हम

बहा के अश्क ज़रा पहले बा-वज़ू हो लें

छुपा के ख़्वाबों ख़यालों को दिल के गोशे में

ज़रा सी देर हक़ीक़त से रू-ब-रू हो लें

बरस गए तो भला आब के सिवा क्या हैं

उन आँसुओं की है क़ीमत की जो लहू हो लें

किताब-ए-दिल को वरक़-दर-वरक़ दिखा देंगे

ज़रा हम आप से तुम और तुम से तू हो लें

न मुझ में मैं ही रहूँ और न तुझ में तू ही रहे

मिलें कुछ ऐसे कि दोनों ही हू-ब-हू हो लें

सफ़र वफ़ा का अधूरा अधूरा है जान लो 'नायाब'

कि जब तलक न दिल-ओ-जाँ लहू लहू हो लें

(1645) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554