पागल हवा के दोश पे जिंस-ए-गिराँ न रख

पागल हवा के दोश पे जिंस-ए-गिराँ न रख

इस शहर-ए-बे-लिहाज़ में अपनी दुकाँ न रख

उस का दिया हुआ है जिस्म उस के सुपुर्द कर

रखने की इस हवस में तू दोनों जहाँ न रख

इस का ज़वाल देख के वो सल्तनत न छोड़

इस ज़िंदगी में लम्हा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ न रख

वो फ़स्ल पक चुकी थी अब उस का भी क्या क़ुसूर

तुझ से कहा था जेब में चिंगारियाँ न रख

वो जिस्म है तो उस को फ़क़त जिस्म ही समझ

पर्दा किसी फ़रेब का फिर दरमियाँ न रख

आएगी हर तरफ़ से हवा दस्तकें लिए

ऊँचा मकाँ बना के बहुत खिड़कियाँ न रख

वो जिस्म खुल रहा है गिरह-दर-गिरह 'नज़र'

ये तीर चूक जाएगा ढीली कमाँ न रख

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