यूँ गँवाता है कोई जान-ए-अज़ीज़

यूँ गँवाता है कोई जान-ए-अज़ीज़

ज़िंदगी होती तो हम रखते अज़ीज़

क्या बताएँ अब बिखर जाने के ब'अद

आशियाँ था या हमें तिनके अज़ीज़

ढूँढता है आज कुंज-ए-आफ़ियत

दिल कभी जिस को थे हंगामे अज़ीज़

हुस्न था उस शहर का आवारगी

और हमें थे पाँव के छाले अज़ीज़

ये न क़िस्सा है न अंदाज़-ए-बयाँ

ये मिरा अहवाल है यार-ए-अज़ीज़

घर में जी लगता नहीं और शहर के

रास्ते लगते नहीं अपने अज़ीज़

इस तरह क्या ऐ ग़ुबार-ए-दिल कोई

रक़्स करता है सर-ए-कू-ए-अज़ीज़

साए हैं जितने गुरेज़ाँ धूप से

धूप को हैं उतने ही साए अज़ीज़

या तअल्लुक़ कुछ न था या आप को

ग़म हमारे हो गए इतने अज़ीज़

सामने आते नहीं और ख़्वाब में

मुँह छुपा लेते हैं दुज़दान-ए-अज़ीज़

आँख है या सैर-गाह-ए-रोज़-ओ-शब

वक़्त है या जादा-ए-उम्र-ए-अज़ीज़

क्या अजब जो दर्द-ओ-ग़म रुख़्सत हुए

वो भी थे आख़िर 'रसा' अपने अज़ीज़

(591) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554