किसी भी तौर तबीअ'त कहाँ सँभलने की
किसी भी तौर तबीअ'त कहाँ सँभलने की
तू मिल भी जाए तो हालत नहीं बदलने की
ख़ुद अपनी हम-सफ़री से भी हो गए महरूम
कि आरज़ू थी तुझे साथ ले के चलने की
किसी तरह तो मिले क़हर-ए-बेकसी से नजात
कोई तो राह हो इस कर्ब से निकलने की
असीर ही रहे हम पिछले अहद-नामों के
हमें ख़बर ही नहीं थी रुतें बदलने की
हवाओं ने हमें जड़ से उखाड़ कर फेंका
कि आरज़ू थी हमें फूलने की फलने की
बना लिया हमें अपनी ही तरह का तू ने
हमें जो ज़िद थी तिरी ख़्वाहिशों में ढलने की
उदास शामों को क्या देख देख रोते हो
अभी तो आएँगी रातें लहू उगलने की
एक ऐसे वक़्त में जब ज़िंदगी भी मौत लगे
'रियाज़' कौन सी सूरत हो दिल बहलने की
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रियाज़ मजीद