मुख़्तसर ही सही मयस्सर है
मुख़्तसर ही सही मयस्सर है
जो भी कुछ है नहीं से बेहतर है
दिन-दहाड़े गुनाह करता हूँ
मो'तबर हो न जाऊँ ये डर है
मंच पर कामयाब हो कि न हो
मुझ को किरदार अपना अज़्बर है
सब को पथरा दिया पलक झपके
हम न कहते थे शोबदा-गर है
ऐन मुमकिन है वो पलट आए
मेरा ईमान मोजज़ों पर है
पहले मौसम पे तब्सिरा करना
फिर वो कहना जो दिल के अंदर है
सारे मंज़र हसीन लगते हैं
दूरियाँ कम न हों तो बेहतर है
रास्ते बैन कर रहे हैं क्यूँ
क्या मसाफ़त ये इंतिहा पर है
फ़स्ल बोई भी हम ने काटी भी
अब न कहना ज़मीन बंजर है
(640) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
साबिर