मुख़्तसर ही सही मयस्सर है

मुख़्तसर ही सही मयस्सर है

जो भी कुछ है नहीं से बेहतर है

दिन-दहाड़े गुनाह करता हूँ

मो'तबर हो न जाऊँ ये डर है

मंच पर कामयाब हो कि न हो

मुझ को किरदार अपना अज़्बर है

सब को पथरा दिया पलक झपके

हम न कहते थे शोबदा-गर है

ऐन मुमकिन है वो पलट आए

मेरा ईमान मोजज़ों पर है

पहले मौसम पे तब्सिरा करना

फिर वो कहना जो दिल के अंदर है

सारे मंज़र हसीन लगते हैं

दूरियाँ कम न हों तो बेहतर है

रास्ते बैन कर रहे हैं क्यूँ

क्या मसाफ़त ये इंतिहा पर है

फ़स्ल बोई भी हम ने काटी भी

अब न कहना ज़मीन बंजर है

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