किसी भी ज़ख़्म का दिल पर असर न था कोई

किसी भी ज़ख़्म का दिल पर असर न था कोई

ये बात जब की है जब चारा-गर न था कोई

किसी से रंग-ए-उफ़ुक़ ही की बात कर लेते

अब इस क़दर भी यहाँ मो'तबर न था कोई

बनाए जाऊँ किसी और के भी नक़्श-ए-क़दम

ये क्यूँ कहूँ कि मिरा हम-सफ़र न था कोई

गुज़र गए तिरे कूचे से अजनबी की तरह

कि हम से सिलसिला-ए-बाम-ओ-दर न था कोई

जिसे गुज़ार गए हम बड़े हुनर के साथ

वो ज़िंदगी थी हमारी हुनर न था कोई

अजीब होते हैं आदाब-ए-रुख़्सत-ए-महफ़िल

कि उठ के वो भी चला जिस का घर न था कोई

हुजूम-ए-शहर में शामिल रहा और इस के ब'अद

'सहर' उधर भी गया मैं जिधर न था कोई

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