चश्म-ए-हैराँ को यूँ ही महव-ए-नज़र छोड़ गए

चश्म-ए-हैराँ को यूँ ही महव-ए-नज़र छोड़ गए

दिल में लहराए ख़यालों में शरर छोड़ गए

जिन के साए में कभी बैठ के सुस्ताया था

वो घने पेड़ मिरी राह-गुज़र छोड़ गए

मुंतज़िर उन के लिए है किसी गिर्दाब की आँख

ख़ुद सफ़ीनों को जो हंगाम-ए-ख़तर छोड़ गए

क़ाफ़िले नूर के उतरे न किसी मंज़िल पर

शब के नम-दीदा किनारों पे सहर छोड़ गए

ख़ीरगी है कि उतरती ही नहीं आँखों से

किन अँधेरों में हमें शम्स-ओ-क़मर छोड़ गए

ले गए लोग जबीनों में इबादत का ग़ुरूर

कितने सज्दों को मगर ख़ाक-बसर छोड़ गए

आए आँखों में न दम भर को सुलगते आँसू

पर्दा-ए-चश्म पे इक नक़्श मगर छोड़ गए

रात के अक्स जो शबनम में उतरने आए

कितने फूलों में 'समद' दाग़-ए-जिगर छोड़ गए

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