दर-ए-मय-ख़ाना से दीवार-ए-चमन तक पहुँचे

दर-ए-मय-ख़ाना से दीवार-ए-चमन तक पहुँचे

हम ग़ज़ालों के तआ'क़ुब में ख़ुतन तक पहुँचे

हाथ मय-ख़्वारों के बे-क़स्द उठे थे लेकिन

इत्तिफ़ाक़न तिरे गेसू की शिकन तक पहुँचे

मदरसे में कहाँ उस ज़ुल्फ़ का मौज़ू-ए-जदीद

लोग पहुँचे तो रिवायात-ए-कुहन तक पहुँचे

रास्ता एक था हम इश्क़ के दीवानों का

क़द-ओ-गेसू से चले दार-ओ-रसन तक पहुँचे

आएँ हम दस्त-दराज़ी पे तो मयख़ाने से

सिलसिला अंजुमन-ए-सर्व-ओ-समन तक पहुँचे

इक क़बा-ए-सुबुक-ओ-तंग में सौ सौ हैं तिलिस्म

क्या कोई हुस्न के असरार-ए-कुहन तक पहुँचे

आप ही आप जो खुल जाए तिरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़

ना-गहाँ बे-हुनरी नुक़्ता-ए-फ़न तक पहुँचे

ऐ सुख़न-फ़हम हम उस बज़्म से आए हैं जहाँ

हैरत आईना-ए-उस्लूब-ए-सुख़न तक पहुँचे

इस तरह शौक़-ए-ग़ज़ालाँ में ग़ज़ल-ख़्वाँ हो ज़फ़र

शोहरत-ए-मुश्क-ए-ग़ज़ल शहर-ए-ख़ुतन तक पहुँचे

(795) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554