मेरे ख़ुश-आइंद-मुस्तक़बिल का पैग़म्बर भी तू
मेरे ख़ुश-आइंद-मुस्तक़बिल का पैग़म्बर भी तू
मेरी बर्बादी का मेरी जान पस-मंज़र भी तू
तू कि फ़ितरत की तरह है किस तरह तस्ख़ीर हो
यार खुश-मंज़र भी तू ज़िद्दी भी तू ख़ुद-सर भी तू
इक तज़ाद-ए-हुस्न-ए-मा'नी है तिरी ता'मीर में
दस्तरस में भी गिरफ़्त-ए-वक़्त से बाहर भी तू
तेरे चेहरे से अयाँ उस के न मिलने का अलम
ख़ुश-नज़र आता नहीं उस शख़्स से मिल कर भी तू
मेरे फ़न की सारी ज़ेबाइश तिरी निस्बत से है
जो छुपा है मेरे शे'रों में वो दानिश-वर भी तू
रूह तो पहले भी थी अब के बदन भी है असीर
अब तो यूँ लगता है जैसे हो मिरा पैकर भी तू
तू ही संग-ए-मील है अपने लिए सुल्तान-'रश्क'
अपने ही रस्ते में जो हाइल है वो पत्थर भी तू
(637) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
सुलतान रशक