साहिल पर दरिया की लहरें सज्दा करती रहती हैं

साहिल पर दरिया की लहरें सज्दा करती रहती हैं

लौट के फिर आने जाने का वादा करती रहती हैं

क्या जाने कब धरती पर सैलाब का मंज़र हो जाए

हर-दम ये मजबूर निगाहें वर्षा करती रहती हैं

उन की नय्या बिन माँझी के पार करेगी सब दरिया

क्यूँकि ढेर दुआएँ जैसे पीछा करती रहती हैं

किस किस मंज़र पर ख़ुद को रंजीदा कर लूँ सोचूँगा

हर मंज़र पर आँखें मेरी नौहा करती रहती हैं

बे-मेहनत जब रोटी क़ैदी बन जाती है थाली की

बे-ग़ैरत सी रातें मुझ से शिकवा करती रहती हैं

पत्थर हो जाएँ या पानी रिम-झिम रिम-झिम बरसाएँ

आँखें सारे मंज़र को आईना करती रहती हैं

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