तिरे आसमाँ की ज़मीं हो गया हूँ
तिरे आसमाँ की ज़मीं हो गया हूँ
हुआ हूँ तो अपने तईं हो गया हूँ
मिली है जगह दिल में थोड़ी सी उस के
समझ लो कि गोशा-नशीं हो गया हूँ
यहाँ पर मैं होना नहीं चाहता था
मगर होते होते यहीं हो गया हूँ
तिरे पाँव पड़ने से इंकार कर दूँ
मैं इतना तो ख़ुद-सर नहीं हो गया हूँ
जहाँ मुझ को होने से रोका था उस ने
नहीं बाज़ आया वहीं हो गया हूँ
मकाँ जिस का नक़्शा अभी बन रहा है
मैं फ़िलहाल उस का मकीं हो गया हूँ
तवज्जोह का तालिब हूँ इस तरह से भी
अगर आप का नुक्ता-चीं हो गया हूँ
बुढ़ापे से अगली ये मंज़िल है कोई
जवाँ हो गया हूँ हसीं हो गया हूँ
इसे भी 'ज़फ़र' मेरी हिम्मत ही समझो
कहीं हो न पाया कहीं हो गया हूँ
(1178) Peoples Rate This
Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554
ज़फ़र इक़बाल