हयूले

समुंदरों के मुहीब तूफ़ाँ मेरे अज़ाएम के साहिलों से शिकस्त खा कर पलट चुके हैं

मैं कोहसारों की हस्तियोंं से भी आसमाँ का वक़ार बन कर उलझ चुका हूँ

मैं जंगलों की हवाओं का ज़ोर तोड़ देता रहा हूँ अपने नफ़स की शोरीदा सतवतों से

मिरे तफ़क्कुर की गर्म-रफ़्तारियों से लर्ज़ां रहे हैं सहराओं के बगूले

ये ज़िक्र है उस तवील माज़ी का मैं अकेला था इस भरी काएनात में जब

फ़क़त मिरी जाँ-गुदाज़ तन्हाई साया बन कर थी साथ मेरे

मैं उन दिनों सोचता था मेरा वजूद आईना-दार ताब-ओ-तवाँ है जिस को

ज़वाल-ए-आमादगी से निस्बत नहीं है कोई

और आज जब कि ये मेरे बच्चे

जिन्हें ज़माने की आँख ने मेरे दस्त-ओ-बाज़ू का रूप समझा

मिरी तवानाइयों के मरकज़ का अक्स जाना

मिरे रग-ओ-पै में एक एहसास-ए-ख़ौफ़ हर-दम उभारते हैं

तो सोचता हूँ

मैं कितना कमज़ोर हो गया हूँ

हवा का इक ना-तवाँ सा झोंका भी उन के पहलू से जब गुज़रता है

लाख अंदेशे जाग उठते हैं मेरे दिल में

अजीब तशवीश घेर लेती है जिस्म-ओ-जाँ की तमाम ताबिंदा वुसअ'तों को

मैं अपने बच्चों को अपनी क़ुव्वत कहूँ कि बे-हिम्मती का मज़हर

(1239) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554