रक़्स करता है ब-अंदाज़-ए-जुनूँ दौड़ता है

रक़्स करता है ब-अंदाज़-ए-जुनूँ दौड़ता है

दिल अगर ख़ुश हो तो चेहरे पे भी ख़ूँ दौड़ता है

कभी सरसब्ज़ है मंज़र कभी बे-आब-ओ-गियाह

किश्त-ए-उम्मीद में ये कैसा फ़ुसूँ दौड़ता है

जज़्बा-ए-इश्क़ बहुत ख़ाक उड़ाता है मगर

कू-ए-जानाँ में ब-अंदाज़-ए-सुकूँ दौड़ता है

सिर्फ़ मख़्लूक़-ए-ख़ुदा पर ही तो मौक़ूफ़ नहीं

सीना-ए-दहर में भी सोज़-ए-दरूँ दौड़ता है

ख़स्तगी ऐसी तो मुझ पर कभी गुज़री ही न थी

अब के सर-ता-ब-क़दम हाल-ए-ज़बूँ दौड़ता है

याद आती ही नहीं ख़ाना-ख़राबी अपनी

मुतमइन घर है अब आँगन में सुकूँ दौड़ता है

कैसी वहशत है कि दम लेने की फ़ुर्सत भी नहीं

जिस को देखो वही हम-रंग-ए-जुनूँ दौड़ता है

ग़ौर करता हूँ तो हर लम्हा-ए-बेताब यहाँ

जितना मैं सोचता था उस से फ़ुज़ूँ दौड़ता है

अपनी रफ़्तार पे नाज़ाँ भी हूँ शर्मिंदा भी

रज़्म-गह में कोई बे-वज्ह भी यूँ दौड़ता है

ऐसी वीरानी तो देखी न सुनी थी 'अख़्तर'

हर तरफ़ आलम-ए-फ़ानी में सुकूँ दौड़ता है

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