आपका Poetry (page 39)

फ़स्ल-ए-गुल फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ जो भी हो ख़ुश-दिल रहिए

अली सरदार जाफ़री

बैठे हैं जहाँ साक़ी पैमाना-ए-ज़र ले कर

अली सरदार जाफ़री

सत्तर माओं का प्यार

अली मोहम्मद फ़र्शी

मेहमान-दारी

अली मंज़ूर हैदराबादी

कँवल हों आब में ख़ुश गुल सबा में शाद रहें

अली अकबर नातिक़

ज़रा हटे तो वो मेहवर से टूट कर ही रहे

अली अकबर अब्बास

सारा दिन बे-कार बैठे शाम को घर आ गए

अली अकबर अब्बास

सारे मौसम बदल गए शायद

अलीना इतरत

बा'द मुद्दत के खुला जौहर-ए-नायाब मिरा

अलीम सबा नवेदी

मोहब्बत का रग-ओ-पै में मिरी रूह-ए-रवाँ होना

अलीम अख़्तर

किराया-दार बदलना तो उस का शेवा था

अलीम अफ़सर

न पूछ रब्त है क्या उस की दास्ताँ से मुझे

अलीम अफ़सर

इस फ़ैसले से ख़ुश हैं अफ़राद घर के सारे

आलम ख़ुर्शीद

क्यूँ आँखें बंद कर के रस्ते में चल रहा हूँ

आलम ख़ुर्शीद

चढ़े हुए हैं जो दरिया उतर भी जाएँगे

अकरम महमूद

अब दिल भी दुखाओ तो अज़िय्यत नहीं होती

अकरम महमूद

हिज्र की शाम से ज़ख़्मों के दोशाले माँगूँ

अकमल इमाम

एक लड़का

अख़्तर-उल-ईमान

ओ देस से आने वाले बता

अख़्तर शीरानी

एक हुस्न-फ़रोश से

अख़्तर शीरानी

आँसू

अख़्तर शीरानी

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें

अख़्तर शीरानी

मिरी आँखों से ज़ाहिर ख़ूँ-फ़िशानी अब भी होती है

अख़्तर शीरानी

वो हुस्न-ए-सब्ज़ जो उतरा नहीं है डाली पर

अख़्तर रज़ा सलीमी

अब नहीं लौट के आने वाला

अख़्तर नज़्मी

दिल के हर ज़ख़्म को पलकों पे सजाया तो गया

अख्तर लख़नवी

हर बुत यहाँ टूटे हुए पत्थर की तरह है

अख़तर इमाम रिज़वी

नज़र से सफ़्हा-ए-आलम पे ख़ूनीं दास्ताँ लिखिए

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

बदन के शहर में आबाद इक दरिंदा है

अख़्तर अमान

पहले हम इश्क़ किया करते थे

अख़्तर अमान

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