पल Poetry (page 18)

हम अपने ज़ख़्म कुरेदते हैं वो ज़ख़्म पराए धोते थे

अब्दुल अहद साज़

हर इक लम्हे की रग में दर्द का रिश्ता धड़कता है

अब्दुल अहद साज़

दिखाई देने के और दिखाई न देने के दरमियान सा कुछ

अब्दुल अहद साज़

अज़दवाजी ज़िंदगी भी और तिजारत भी अदब भी

अब्दुल अहद साज़

अहल-ए-जुनूँ थे फ़स्ल-ए-बहाराँ के सर गए

अब्बास रिज़वी

मिरी यादें भला तुम किस तरह दिल से मिटाओगे

आज़िम कोहली

एक इक लम्हे को पलकों पे सजाता हुआ घर

आदिल रज़ा मंसूरी

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