उम्मीद Poetry (page 8)

ज़िंदगी जैसी तवक़्क़ो' थी नहीं कुछ कम है

शहरयार

जहाँ मैं होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा

शहरयार

हवा का ज़ोर ही काफ़ी बहाना होता है

शहरयार

अक्स को क़ैद कि परछाईं को ज़ंजीर करें

शहरयार

मेज़ पे चेहरा ज़ुल्फ़ें काग़ज़ पर

शहनवाज़ ज़ैदी

है शर्त क़ीमत-ए-हुनर भी अब तो रब्त-ए-ख़ास पर

शाहिदा तबस्सुम

ज़िंदगी मेरी हुई है फिर निढाल

शाहिद नईम

ऐसे भी कुछ ग़म होते हैं

शाहिद मीर

रग रग में मेरी फैल गया है ये कैसा ज़हर

शाहिद माहुली

बुझे बुझे से चराग़ों से सिलसिला पाया

शाहिद माहुली

भटक रही है अंधेरों में आँख देखे क्या

शाहिद माहुली

लोग हैरान हैं हम क्यूँ ये किया करते हैं

शाहिद लतीफ़

आज भी जिस की है उम्मीद वो कल आए हुए

शाहिद लतीफ़

हवा की डोर में टूटे हुए तारे पिरोती है

शाहिद कमाल

तुम से मिलते ही बिछड़ने के वसीले हो गए

शाहिद कबीर

कहीं का ग़ुस्सा कहीं की घुटन उतारते हैं

शाहिद जमाल

लज़्ज़त-ए-संग न पूछो लोगो उम्र अगर हाथ आए फिर

शाहिद इश्क़ी

जिस को चाहा था न पाया जो न चाहा था मिला

शाहिद इश्क़ी

जिस को चाहा था न पाया जो न चाहा था मिला

शाहिद इश्क़ी

वो बे-नियाज़ शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल गया

शाहिद अहमद शोएब

याद उस की है कुछ ऐसी कि बिसरती भी नहीं

शहाब जाफ़री

दश्त-ए-ग़ुर्बत है तो वो क्यूँ हैं ख़फ़ा हम से बहुत

शहाब जाफ़री

हमारे पास था जो कुछ लुटा के बैठ रहे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

कभी तो उन को हमारा ख़याल आएगा

शफ़क़त काज़मी

हमारे हाल पे किस दिन जफ़ा नहीं करते

शफ़क़त काज़मी

उम्र भर डोलती यादों की ज़िया से खेले

शफ़क़त बटालवी

क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा

शाद अज़ीमाबादी

किस पे क़ाबू जो तुझी पे नहीं क़ाबू अपना

शाद अज़ीमाबादी

हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़

शाद अज़ीमाबादी

अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा

शाद अज़ीमाबादी

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