रहस्य Poetry (page 23)

क्यूँ मिरा हाल क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

बेखुद बदायुनी

उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं

बहज़ाद लखनवी

इक बे-वफ़ा को प्यार किया हाए क्या किया

बहज़ाद लखनवी

तेरी उल्फ़त शोबदा-पर्वाज़ है

बेदम शाह वारसी

सीने में दिल है दिल में दाग़ दाग़ में सोज़-ओ-साज़-ए-इश्क़

बेदम शाह वारसी

में ग़श में हूँ मुझे इतना नहीं होश

बेदम शाह वारसी

काश मिरी जबीन-ए-शौक़ सज्दों से सरफ़राज़ हो

बेदम शाह वारसी

कभी यहाँ लिए हुए कभी वहाँ लिए हुए

बेदम शाह वारसी

हलाक-ए-तेग़-ए-जफ़ा या शहीद-ए-नाज़ करे

बेदम शाह वारसी

छिड़ा पहले-पहल जब साज़-ए-हस्ती

बेदम शाह वारसी

बताए देती है बे-पूछे राज़ सब दिल के

बेदम शाह वारसी

जिगर-गुदाज़ मआ'नी समझ सको तो कहूँ

बेबाक भोजपुरी

नहीं ये जल्वा-हा-ए-राज़-ए-इरफ़ाँ देखने वाले

बासित भोपाली

जैसे भी ये दुनिया है जो कुछ भी ज़माना है

बासित भोपाली

वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर गो है बात मेरी

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

यूँ खुल गया है राज़-ए-शिकस्त-ए-तलब कभी

बशीर ज़ैदी असीर

जब सहर चुप हो हँसा लो हम को

बशीर बद्र

हम तिरे बंदे हमारा तू ख़ुदा-वंद-ए-करीम

बशीर-उन-निसा बेगम बर्क़

जल्वों का उन के दिल को तलब-गार कर दिया

बशीरुद्दीन राज़

छुप सका दम भर न राज़-ए-दिल फ़िराक़-ए-यार में

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

किस तरह मिलें कोई बहाना नहीं मिलता

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

चाँद सा चेहरा जो उस का आश्कारा हो गया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

मेरे सनम-कदे में कई और बुत भी हैं

बाक़र मेहदी

जहन्नम

बाक़र मेहदी

बहुत है एक नज़र

बाक़र मेहदी

ज़र्रे का राज़ मेहर को समझाना चाहिए

बाक़र मेहदी

लरज़ लरज़ के न टूटें तो वो सितारे क्या

बाक़र मेहदी

दुश्मन-ए-जाँ कोई बना ही नहीं

बाक़र मेहदी

चाहा बहुत कि इश्क़ की फिर इब्तिदा न हो

बाक़र मेहदी

बहुत ज़ी-फ़हम हैं दुनिया को लेकिन कम समझते हैं!

बाक़र मेहदी

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