बात Poetry (page 89)

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

इस क़दर ग़म है कि इज़हार नहीं कर सकते

अय्यूब ख़ावर

इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के

अय्यूब ख़ावर

उस निगाह-ए-नाज़ ने यूँ रात-भर तज्सीम की

औरंगज़ेब

इश्क़ क्या है बेबसी है बेबसी की बात कर

औरंगज़ेब

अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया

औरंगज़ेब

अब कोई और मुसीबत तो न पाली जाए

औरंगज़ेब

गह मश्क़-ए-सितम गाह-ए-करम याद करेंगे

औलाद अली रिज़वी

वो बात थी तो कई दूसरे सबब भी थे

अतीक़ुल्लाह

ख़्वाबों की किर्चियाँ मिरी मुट्ठी में भर न जाए

अतीक़ुल्लाह

फ़रार के लिए जब रास्ता नहीं होगा

अतीक़ुल्लाह

वो बात जिस से ये डर था खुली तो जाँ लेगी

आतिफ़ ख़ान

एक वो ही शख़्स मुझ को अब गवारा भी नहीं

आतिफ़ ख़ान

यही जो तेरे मिरे दिल की राजधानी थी

अतहर नासिक

अगर यक़ीन न रखते गुमान तो रखते

अतहर नासिक

वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या

अतहर नफ़ीस

क्या बात निराली है मुझ में किस फ़न में आख़िर यकता हूँ

अतहर नफ़ीस

मैं कि ख़ुद अपने ख़यालात का ज़िंदानी हूँ

अतहर नादिर

किस दर्जा मिरे शहर की दिलकश है फ़ज़ा भी

अतहर नादिर

वो बात मुझ को तो दुश्नाम सी लगी है 'अतीक़'

अतीक़ असर

शिकायत है बहुत लेकिन गिला अच्छा नहीं लगता

अतीक़ असर

ग़म ये नहीं कि ग़म से मुलाक़ात हुई

अतीक़ असर

मैं तुम से तर्क-ए-तअल्लुक की बात क्यूँ सोचूँ

अतीक़ अंज़र

उदास बैठा दिए ज़ख़्म के जलाए हुए

अतीक़ अंज़र

जुदाई हद से बढ़ी तो विसाल हो ही गया

अतीक़ इलाहाबादी

अगरचे लाई थी कल रात कुछ नजात हवा

अतीक़ इलाहाबादी

कुछ ख़्वाब कुछ ख़याल में मस्तूर हो गए

अताउर्रहमान जमील

ज़िंदगी आईना है आईना-आराई है

अता शाद

सर पे सूरज हो मगर साया न हो ऐसा न था

अता आबिदी

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