चीन Poetry (page 10)

उठे तिरी महफ़िल से तो किस काम के उठ्ठे

बेख़ुद देहलवी

जिस में सौदा नहीं वो सर ही नहीं

बेखुद बदायुनी

तुम याद मुझे आ जाते हो

बहज़ाद लखनवी

चश्म-ए-हसीं में है न रुख़-ए-फ़ित्ना-गर में है

बहज़ाद लखनवी

न मेहराब-ए-हरम समझे न जाने ताक़-ए-बुत-ख़ाना

बेदम शाह वारसी

मुझे शिकवा नहीं बर्बाद रख बर्बाद रहने दे

बेदम शाह वारसी

कभी यहाँ लिए हुए कभी वहाँ लिए हुए

बेदम शाह वारसी

इश्वा है नाज़ है ग़म्ज़ा है अदा है क्या है

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या

बासित भोपाली

तज़्किरे में तिरे इक नाम को यूँ जोड़ दिया

बशीर फ़ारूक़ी

रस्म-ए-सज्दा भी उठा दी हम ने

बाक़ी सिद्दीक़ी

हम ज़र्रे हैं ख़ाक-ए-रहगुज़र के

बाक़ी सिद्दीक़ी

रखता है यूँ वो ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम दोश पर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

आज़मा लो कि दिल को चैन आए

बाक़र मेहदी

गोडो

बाक़र मेहदी

ख़बर सुनेगा मिरी मौत की तो ख़ुश होगा

बाक़र मेहदी

दुश्मन-ए-जाँ कोई बना ही नहीं

बाक़र मेहदी

याँ ख़ाक का बिस्तर है गले में कफ़नी है

ज़फ़र

प्यारा प्यारा घर अपना

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

एक मंज़र एक आलम

अज़ीज़ क़ैसी

अल्फ़-ए-लैला की आख़िरी सुब्ह

अज़ीज़ क़ैसी

ये किस मक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे

अज़ीज़ नबील

बातों में बहुत गहराई है, लहजे में बड़ी सच्चाई है

अज़ीज़ नबील

लज़्ज़त-ए-ग़म

अज़ीज़ लखनवी

न हुई हम से शब बसर न हुई

अज़ीज़ लखनवी

मैं समुंदर था मुझे चैन से रहने न दिया

अज़हर इनायती

उश्शाक़ बहुत हैं तिरे बीमार बहुत हैं

अय्यूब ख़ावर

आज शब-ए-मेराज होगी इस लिए तज़ईन है

औरंगज़ेब

मिरी मुश्किल अगर आसाँ बना देते तो अच्छा था

अतीक़ुर्रहमान सफ़ी

नौ-जवान ख़ातून से

असरार-उल-हक़ मजाज़

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