दम Poetry (page 35)

नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का

ग़ालिब

नाला जुज़ हुस्न-ए-तलब ऐ सितम-ईजाद नहीं

ग़ालिब

न होगा यक-बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा

ग़ालिब

मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए

ग़ालिब

माना-ए-दश्त-नवर्दी कोई तदबीर नहीं

ग़ालिब

ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है

ग़ालिब

कल के लिए कर आज न ख़िस्सत शराब में

ग़ालिब

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना

ग़ालिब

हुई ताख़ीर तो कुछ बाइस-ए-ताख़ीर भी था

ग़ालिब

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

ग़ालिब

है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ और

ग़ालिब

गुलशन को तिरी सोहबत अज़-बस-कि ख़ुश आई है

ग़ालिब

ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के

ग़ालिब

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब

ग़ालिब

देखना क़िस्मत कि आप अपने पे रश्क आ जाए है

ग़ालिब

देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे

ग़ालिब

दर-ख़ूर-ए-क़हर-ओ-ग़ज़ब जब कोई हम सा न हुआ

ग़ालिब

दहर में नक़्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआ

ग़ालिब

बे-ए'तिदालियों से सुबुक सब में हम हुए

ग़ालिब

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे

ग़ालिब

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना

ग़ालिब

बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है

ग़ालिब

अजब नशात से जल्लाद के चले हैं हम आगे

ग़ालिब

वो टुकड़ा रात का बिखरा हुआ सा

गौतम राजऋषि

शाइरी बात नहीं गर्म-ए-सुख़न होने की

गौहर होशियारपुरी

रुख़ हवाओं के किसी सम्त हों मंज़र हैं वही

फ़ुज़ैल जाफ़री

क़दम क़दम पे हैं बिखरी हक़ीक़तें क्या क्या

फ़ुज़ैल जाफ़री

कुत्तों का मुशाएरा

फ़ुर्क़त काकोरवी

फैमली-प्लैनिंग

फ़ुर्क़त काकोरवी

कहाँ का वस्ल तन्हाई ने शायद भेस बदला है

फ़िराक़ गोरखपुरी

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