नदी Poetry (page 55)

क्या ख़बर कब से प्यासा था सहरा

आबिद आलमी

ख़्वाब में गर कोई कमी होती

आबिद आलमी

जो शख़्स तुझ को फ़रिश्ता दिखाई देता है

आबिद आलमी

आँख थी सूजी हुई और रात भर सोया न था

अब्दुस्समद ’तपिश’

हक़ मिरा मुझ को मिरे यार नहीं देते हैं

अब्दुश्शुकूर आसी

मेज़ क़लम क़िर्तास दरीचा सन्नाटा

अब्दुर्राहमान वासिफ़

सफ़ेद-पोश दरिंदों ने गुल खिलाए थे

अब्दुर्रहीम नश्तर

साहिल पे लोग यूँही खड़े देखते रहे

अब्दुल्लाह जावेद

चाँदनी का रक़्स दरिया पर नहीं देखा गया

अब्दुल्लाह जावेद

चमका जो चाँद रात का चेहरा निखर गया

अब्दुल्लाह जावेद

मस्त अँखियाँ का देख दुम्बाला

अब्दुल वहाब यकरू

गल को शर्मिंदा कर ऐ शोख़ गुलिस्तान में आ

अब्दुल वहाब यकरू

अगर वो गुल-बदन दरिया नहाने बे-हिजाब आवे

अब्दुल वहाब यकरू

पा के तूफ़ाँ का इशारा दरिया

अब्दुल मन्नान तरज़ी

वो सूरज इतना नज़दीक आ रहा है

अब्दुल हमीद अदम

बहुत से लोगों को ग़म ने जिला के मार दिया

अब्दुल हमीद अदम

ऐ साक़ी-ए-मह-वश ग़म-ए-दौराँ नहीं उठता

अब्दुल हमीद अदम

कभी देखो तो मौजों का तड़पना कैसा लगता है

अब्दुल हमीद

इस से पहले कि हमें अहल-ए-जफ़ा रुस्वा करें

अब्दुल हमीद साक़ी

हुस्न इक दरिया है सहरा भी हैं उस की राह में

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

इस तिलिस्म-ए-रोज़-ओ-शब से तो कभी निकलो ज़रा

अब्दुल हफ़ीज़ नईमी

अपनी हस्ती से था ख़ुद मैं बद-गुमाँ कल रात को

अब्दुल अलीम आसि

मिरी निगाहों पे जिस ने शाम ओ सहर की रानाइयाँ लिखी हैं

अब्दुल अहद साज़

लफ़्ज़ का दरिया उतरा दश्त-ए-मआनी फैला

अब्दुल अहद साज़

ये देख मिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा मिरे आगे

अब्बास ताबिश

वो चाँद हो कि चाँद सा चेहरा कोई तो हो

अब्बास ताबिश

सुब्ह की पहली किरन पहली नज़र से पहले

अब्बास ताबिश

शिकस्ता-ख़्वाब-ओ-शिकस्ता-पा हूँ मुझे दुआओं में याद रखना

अब्बास ताबिश

निगाह-ए-अव्वलीं का है तक़ाज़ा देखते रहना

अब्बास ताबिश

मह-रुख़ जो घरों से कभी बाहर निकल आए

अब्बास ताबिश

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